मजा आ गया

Just another weblog

12 Posts

2 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 11627 postid : 3

ऊँचा सोचो

Posted On: 10 Jun, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

मेरी समझ में यह नहीं आता है कि जब भी कोई देश के लिये जरा सा भी बड़ा सोचे तो लोगों को उसमें भ्रष्टाचार क्यों नजर आने लगता हैं. अब इधर योजना आयोग ने पैंतिस लाख के दो टॉयलेट क्या रिपेयर करवा दिये कि लोगों ने फिज़ूल खर्ची का आरोप ही मढ़ दिया. भइया योजना आयोग है तो किसी योजना के तहत ही तो किया होगा इत्ता खर्च. आलोचना करने वालों को पता भी है कि वो कोई मामूली टायलेट नहीं हैं जैसे हम जैसे गरीबों के होते हैं. उनमें इतनी जगह है कि साठ अफसर एक साथ मिलकर कॉनफ्रैंस तक कर सकते हैं. अब पैंतिस लाख में पूरा टॉयलेट कम कॉनफ्रैंस रुम बन गया तो क्या कोई ज्यादा है. उनमें जाने वाले अफसर भी ना तो कोई मामूली अफसर होंगे, ना ही उनके विचार मामूली होंगे और ना ही वो जो भी वहां कर के आयेंगे वो ही मामूली होगा. उनमें वो अधिकारी जायेंगे जो देश के लिये यह प्लान करने का काम करते हैं कि कैसे देश से गरीबों को समाप्त किया जा सके. वो अफसर बीस बीस हजार का खाना एक समय में खाते हैं तो टायलेट भी तो मँहगा ही यूज़ करेंग ना. तुम्हारी तरह थोड़े ही कि चना मुरमुरा खा लिया और सुलभ शौचालय में जा के बैठ गये पाँच रुपये देकर. अरे अच्छा लगेगा कि इतना बड़ा अधिकारी बीस हजार का खाना खाकर सुलभ शौचालय में जाकर बैठा है. देश की नाक नहीं कट जायगी. ऊपर से साठ अधिकारी दो टाइम अगर पाँच पाँच रुपये सुलभ शौचालय में देंगे तो पर डे कितना खर्च आयेगा. पर मंथ जोड़ो और फिर पर इयर जोड़ो तब कहीं पता चलेगा कि देश के कितने हार्ड अर्न मनी पर सुलभ शौचालय में पानी फिर गया. और वो कोई काला धन नहीं है कि किसी बाबा के शोर मचाने से तड़ से वापस आ जायेगा. इसे कहते हैं प्लानिंग. वैसे भी बुरी बात है किसी के टायलेट में झांकना. जिनके खुद के टायलेट खुले में हों वो किसी दूसरे के टायलेटो में झांका नहीं करते. प्लानिंग कमीशन ने इस बात की भी प्लानिंग की हुयी है कि खर्च को कैसे कम किया जा सके. आम जनता ताजमहल नहीं बनवा पाती तो क्या ताजमहल देखने तो जाती है. उनके टायलेट करने के बाद दोपहर में टिकट लगाकर गरीब जनता को दिखाया जायगा कि देखो यहां पर तुम्हारी गरीबी दूर करने के लिये प्लानिंग की जाती है. जो लोग उनकी महक ही ले लेंगे उनकी सोच भी हाई लेविल की बन जायगी. इस तरह से टायलेट का सारा पैसा साल भर में वसूल हो जायगा. अगर इंसान का पेट ठीक रहेगा तभी तो चिंतन ठीक होगा. तभी योजनायें ठीक बनेंगी. लोग तो बस पाकिस्तान और बांगलादेश जैसे गरीब देशों की तरह ही सोचते रहेंगे हमेशा. कभी तो ऊंचा सोचो जरा .

लेखक
उमेश मोहन धवन

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 3.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
June 13, 2012

जो लोग उनकी महक ही ले लेंगे उनकी सोच भी हाई लेविल की बन जायगी. इस तरह से टायलेट का सारा पैसा साल भर में वसूल हो जायगा. अगर इंसान का पेट ठीक रहेगा तभी तो चिंतन ठीक होगा. तभी योजनायें ठीक बनेंगी. लोग तो बस पाकिस्तान और बांगलादेश जैसे गरीब देशों की तरह ही सोचते रहेंगे हमेशा. कभी तो ऊंचा सोचो जरा बिलकुल जिस देश के आधे से ज्यादा लोग सुबह सुबह lota lekar khule mein shochalay jaate hon , vahaan 35 lakh के toilet hone jaroori hai ?


topic of the week



latest from jagran